मोहन सोमलकर

मोहन सोमलकर कवी कवयत्री समुह लिपीनाते जपणारी शब्दांच्या पलीकडली माणसे जोपासती हेची काव्य पुष्प.

सोमवार, २० सप्टेंबर, २०२१

तीन माॅ..!

 आदमी( पुरुष) की तीन माॅ ये होती है..!

एक जो हमे जनम देती है...!

पालती है.....!

पोसती है..!

बडा करती है...!

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दुसरी अपनी पत्नी होती..!

उसमेभी अपने माॅ का रुप है..!

जो जीवनभर हमे समजती,सहती है..!

अपने साथ जिन्दगी बिताती है..!

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तिसरी अपनी बिटियाॅ रानी है



जो बुढापे मे अपनी लाठी होती है..!

सहारा होती, अपने को बच्चे जैसे संभालती..!


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यही जिन्दगी है....!

You people got it.,...!

😊😊😊😊😊😊😊😊🙏💥😅😅💦

मोहन सोमलकर 🙏🍁




जिन्दगी हसती है..!

 


जब होता है इन्सान का जनम
तब उसकी तकदिर लिखी जाती है..!

इन्सान को वक्त से पहले और तकदिर
से ज्यादा कुछ नही मिलता..!
फिर क्यो आदमी इतना दौडधुप करता...!

जिन्दगी तु  मुझे गम दे, खुशी दे,
मगर किसीके सामने हाथ फैलाने की नौबत न दे..!

दिल की कलम से लिखता हु....!
मन की शाई से लिखता हु...!

शब्दो मे जिता हु...!
शब्दो मे मरता हु...!
शाहिरी मे.... मै अपनी जिन्दगानी लिखता हु.!

अब सबके लिये.....!

रंजो गम के पहाड मिले..!
फुल के जगह काटे मिले..!

न डगमगाना, न हार मानना..!
वो तो अपना साहस,मन, और अपना धैर्य टटोलने को मिले...!

मै आपका शुक्रगुजार हु..!
जो मुझे आप जैसे लोग मिले..!

बरसात दु:खो की जीवन मे हो जाए..!
खुशियाॅ दुर चली जाऐ..!
हार न मानना कभी....!
ना जान कब कहाॅ..!
कोई  मोड पर जिन्दगी
हसती मिल जाए...!

धन्यवाद!
मोहन सोमलकर 🙏🙏🙏🙏


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