मोहन सोमलकर

मोहन सोमलकर कवी कवयत्री समुह लिपीनाते जपणारी शब्दांच्या पलीकडली माणसे जोपासती हेची काव्य पुष्प.

सोमवार, २० सप्टेंबर, २०२१

जिन्दगी हसती है..!

 


जब होता है इन्सान का जनम
तब उसकी तकदिर लिखी जाती है..!

इन्सान को वक्त से पहले और तकदिर
से ज्यादा कुछ नही मिलता..!
फिर क्यो आदमी इतना दौडधुप करता...!

जिन्दगी तु  मुझे गम दे, खुशी दे,
मगर किसीके सामने हाथ फैलाने की नौबत न दे..!

दिल की कलम से लिखता हु....!
मन की शाई से लिखता हु...!

शब्दो मे जिता हु...!
शब्दो मे मरता हु...!
शाहिरी मे.... मै अपनी जिन्दगानी लिखता हु.!

अब सबके लिये.....!

रंजो गम के पहाड मिले..!
फुल के जगह काटे मिले..!

न डगमगाना, न हार मानना..!
वो तो अपना साहस,मन, और अपना धैर्य टटोलने को मिले...!

मै आपका शुक्रगुजार हु..!
जो मुझे आप जैसे लोग मिले..!

बरसात दु:खो की जीवन मे हो जाए..!
खुशियाॅ दुर चली जाऐ..!
हार न मानना कभी....!
ना जान कब कहाॅ..!
कोई  मोड पर जिन्दगी
हसती मिल जाए...!

धन्यवाद!
मोहन सोमलकर 🙏🙏🙏🙏


१० टिप्पण्या:

  1. खूप खूप मस्त रचना अप्रतिम sr...👌👌👌🌺🌹🌹🌺💗

    उत्तर द्याहटवा
  2. बोहोत खूब लीखा है जी आपणे....👌👌👌
    💐💐💐प्रेम कवु...

    उत्तर द्याहटवा

तुमच्या बहुमोल समिक्षा आम्हास प्रोत्साहन देतात.

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